September 19, 2021

@अब कांग्रेस राजस्थान पर करेगी फोकस। हरीश रावत जैसी भूमिका में है प्रभारी अजय माकन। मंत्रिमंडल मे फेरबदल की सुगबुगाहट।

धर्मपाल वर्मा

दक्ष दर्पण समाचार सेवा

चंडीगढ़ । [email protected]
पंजाब सहित चुनावी राज्यों में कांग्रेस में खींचतान मिटाने के प्रयास करने के बाद राजस्थान की बारी आएगी। कांग्रेस राजस्थान में जल्द मंत्रिमंडल विस्तार, राजनीतिक नियुक्तियों और संगठनात्मक नियुक्तियों का काम निपटाने करने की तैयारी में है। सचिन पायलट खेमे की मांगों का भी इसमें ध्यान रखा जाएगा। पायलट खेमे से तीन या इससे ज्यादा विधायकों को मंत्री बनाया जा सकता है। किस खेमे से कितने मंत्री बनेंगे, यह आलाकमान तय करेगा। अशोक गहलोत और सचिन पायलट खेमों को मंत्रिमंडल, राजनीतिक नियुक्तियों और कांग्रेस संगठन में भागीदारी देने का स्वीकार्य फार्मूला तैयार हो रहा है। राजस्थान में अभी मुख्यमंत्री के अलावा 20 मंत्री हैं। प्रदेश में कुल 30 मंत्री बन सकते हैं, इस लिहाज से 9 जगह खाली हैं। इन 9 जगहों के लिए कांग्रेस के दोनों खेमों में करीब 40 से ज्यादा दावेदार हैं। राजस्थान में बसपा से कांग्रेस में शामिल हुए विधायकों को भी मंत्रिमंडल में कम या ज्यादा प्रतिनिधित्व देने के फार्मूले पर भी विचार किया जा सकता है।सचिन पायलट गुट अपने लिए जितनी अपेक्षा कर रहा है, उस पर पहले मुख्यमंत्री गहलोत तैयार नहीं थे। मंत्रिमंडल विस्तार में देरी के पीछे गहलोत का सहमत नहीं होना ही बताया जा रहा है। अशोक गहलोत पायलट कैंप को उसके विधायकों के हिसाब से ही मंत्री बनाने के फार्मूला पर जोर दे रहे हैं, जबकि पायलट ग्रुप पहले से ज्यादा मंत्री बनाने की मांग कर रहा है। कांग्रेस के सूत्रों के हिसाब से देखा जाए तो पंजाब वाले फार्मूले की तरह राजस्थान में भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ही बने रहेंगे। सचिन पायलट के लिए हाईकमान ने क्या सोचा है इसको लेकर कयास ही लगाए जा सकते हैं परंतु हाईकमान कुछ नया जरूर करने जा रहा है। एक बात जरूर है कि हाईकमान सभी प्रदेशों में नए नेतृत्व की तलाश कर रहा है और पुराने मठाधीश नेताओं को भविष्य में सलाहकार की भूमिका में लाकर उन्हें सत्ता से बाहर करने की कोशिश में लगा हुआ है। कांग्रेस से भविष्य में पंजाब और उत्तराखंड में सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है और भविष्य में उसकी नजर राजस्थान और हिमाचल प्रदेश पर खास तौर पर है ।इन में पंजाब को छोड़कर सभी प्रदेशों में उसका सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी से है। अब अगले संसदीय चुनाव तक श्रीमती सोनिया गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में रह सकती हैं परंतु पार्टी का व्यावहारिक संचालन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की जुगलबंदी के हाथ में रहेगा। अब कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता यह महसूस करने लगे हैं कि राहुल गांधी एक सशक्त भूमिका में परिपक्व नेता के रूप में देखे जाने लगे हैं। यही कारण है कि अब बहुत लोग भाजपा का विकल्प कांग्रेस और नरेंद्र मोदी का विकल्प राहुल गांधी को ही मानने लगे हैं। धीरे-धीरे कांग्रेस नए कलेवर में नजर आने लगी है। अब देखते हैं कि कांग्रेस राजस्थान की मरुभूमि में बड़े नेताओं में तालमेल स्थापित करने के लिए किस फार्मूले पर काम करती है।

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